कैसे कैसे धागों से बुनी है ये दुनिया
हाँ कैसे कैसे धागों से बुनी है ये दुनिया
कभी धूप कभी बादलों की ये लड़ियाँ
कुछ तूने सी है, मैंने की है रफू
ये डोरियाँ..
कुछ तूने सी है, मैंने की है रफू
कभी धूप कभी बादलों की ये लड़ियाँ
कुछ तूने सी है, मैंने की है रफू
ये डोरियाँ..
कुछ तूने सी है, मैंने की है रफू
रफू...
हम करते रहे रफू, धागे उलझते रहे
रफू...
हम करते रहे रफू, धागे उलझते रहे
उलझनों के इस मेले में
किनारों पे हम हँसते रहे
हम करते रहे रफू, धागे उलझते रहे
रफू...
हम करते रहे रफू, धागे उलझते रहे
उलझनों के इस मेले में
किनारों पे हम हँसते रहे
कुछ तुमने सी है, मैंने की है रफू
ये डोरियाँ..
कुछ तुमने सी है, मैंने की है रफू
ये डोरियाँ..
कुछ तुमने सी है, मैंने की है रफू
गाहे बगाहे कुछ ख़्वाब टूटे
गाहे बगाहे कुछ ख़्वाब टूटे
नींदों के धागे हाथों से छूटे
फिर भी सिलते रहे, फिर भी बुनते रहे
उम्मीदों के टाँके हम चुनते रहे
गाहे बगाहे कुछ ख़्वाब टूटे
नींदों के धागे हाथों से छूटे
फिर भी सिलते रहे, फिर भी बुनते रहे
उम्मीदों के टाँके हम चुनते रहे
कुछ तुमने सी है, मैंने की है रफू
ये डोरियाँ..
कुछ तुमने सी है, मैंने की है रफू.......